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अल्पसंख्यक हित

बहुमत के नियम और अल्पसंख्यक के अधिकारों के बीच संतुलन

1. शेयरधारक प्रजातंत्र को परिभाषित करने वाला मूल सिद्धांत है कि बहुसंख्यक का नियम चले। तथापि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि बहुसंख्यक के इस अधिकार को उचित सीमाओं में रखा जाए और इसके परिणास्वरूप अल्पसंख्यक का शोषण और कंपनी का कुप्रबंधन न हो। अतः अल्पसंख्यक हितों को भी निर्णय स्तरों पर उनके मत को शामिल करने के लिए महत्व दिया जाए। कानून में इस प्रकार का तंत्र उपलब्ध कराया जाए। यदि आवश्यक हो तो जिन मामलो में अल्पसंख्यकों के साथ कानून का उल्लंघन करते हुए अनुचित व्यवहार किया जाता है उनके हितों और कंपनी के हितों की सुरक्षा के लिए किसी समुचित संस्था से संपर्क करने का प्रावधान किया जाए। कानून में कारपोरेट मामलो में कंपनी का नियंत्रण ऱखने वाले व्यक्तियों अर्थात् बहुसंख्यकों को अनुमति दिए बिना सर्वसम्मति के आधार पर प्रभावी निर्णय प्रक्रिया में संतुलन बनाना चाहिए ताकि उनके अपने गलत कार्यों से उत्पन्न समाधान के लिए कार्रवाई की जा सकें।

अल्पसंख्यक और ‘अल्पसंख्यक हित’ को महत्वपूर्ण कानून में निर्दिष्ट किया जाए।

2.1 फिलहाल शेयरपूंजी वाली कंपनी जिसके कम से कम 100 सद्स्य अथवा कुल सदस्यो में से 1/10 सदस्य, जो भी कम हो या कोई सदस्य जिनके जारी शेयरपूंजी में कम से कम 1/10 शेयर हों, को शोषण और कुप्रबंधन के मामले में सीएलबी/एनसीएलटी को आवेदन करने का अधिकार है। कुल सदस्यों के कम से कम 1/5 सदस्यों के पास शेयरपूंजी है, आवेदन कर सकते हैं।
2.2 “अलपसंख्यक” के हितों को दर्शाने के लिए शेयरपूंजी वाली कंपनियों के मामले में 10 प्रतिशत और अन्य कंपनियों के मामले में 20 प्रतिशत का मानक वर्तमान अधिनियम में रखा गया है। अधिनियम की धारा 395 में असहमत शेयरधारकों की सीमा 10 प्रतिशत शेयरों तक रखी गई है। इस प्रकार अल्पसंख्यकों के अधिकारो हेतु उचित मंच के समक्ष आवेदन करने के सीमित प्रयोजन के लिए 10 प्रतिशत अनाधिक शेयर परिभाषित किए जा सकते हैं।
2.3 धारा 397 (2) में शोषण परिभाषित किया गया है। यह जनहित के प्रतिकूल या किसी सदस्य या सदस्यों के विरूद्ध कंपनी के कार्य चलाना है। अधिनियम की धारा 398(1) में कुप्रबंधन की परिभाषा कंपनी के कार्य जनहित और कंपनी के हितों के विरूद्ध चलाना परिभाषित किया गया है।
2.4 वर्तमान प्रावधानों की जांच संबंधी समिति का विचार है कि “अल्पसंख्यक” (उपर्युक्त खंड (2.2) के अनुरूप) और “अल्पसंख्यक हित” (उपर्युक्त खंड (2.3) के अनुरूप) परिभाषित करने के लिए नए अधिनियम में विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं।

अल्पसंख्यक हितों का प्रतिनिधित्व

3. समिति का विचार है कि स्वतंत्र निदेशकों की संकल्पना से प्रबंधन की निष्पक्ष जांच, परिचालन और निर्णय प्रक्रिया, कंपनी के बोर्ड आदि से भी अल्पसंख्यक शेयरधारकों के प्रतिनिधित्व को शामिल किया जा सकता है। यह देखा गया कि वर्तमान अधिनियम में निदेशकों की नियुक्ति के लिए अऩुपातिक प्रतिनिधित्व अपनाने का विकल्प दिया गया है परंतु इसका प्रयोग कम है। यह विचार व्यक्त किया गया कि धारा 265(वर्तमान अधिनियम) के प्रावधानों की प्रयोज्यता को अनिवार्य किया जाए। अल्पसंख्यक शेयरधारकों द्वारा नियुक्त निदेशक/स्वतंत्र निदेशक भी निवेशक संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। समिति का विचार था कि वर्तमान विकल्प को जारी रखा जाए।

शेयरधारकों के अधिकार सही प्रकटीकरण के माध्यम से सूचित किए जाएं।

4. निवेशकों के जोखिम को पर्याप्त पारदर्शिता और प्रकटीकरण द्वारा घटाया/कम किया जा सकता है। कानून में यह स्पष्ट उल्लेख किया जाए कि कंपनी के सदस्यों को वह सभी सूचना समयबद्ध रूप से दी जाएगी जो उन्हें मिलने का अधिकार है। शेयरधारकों को दी जाने वाली वित्तीय सूचना और प्रकटीकरण व्यापक रूप से तकनीकी प्रपत्र की बजाय सरल रूप में उपलब्ध कराई जाएगी। इससे कंपनी की विश्वसनीयता बढेगी और शेयरधारक अपने निवेश के संबंध में विवेकपूर्ण निर्णय ले सकेंगे। इसके अतिरिक्त कानून द्वारा नियमित की जाने वाली सांविधिक सूचना भी प्रिंट, इलेक्ट्रानिक माध्यम, कंपनी वेबसाइट आदि जैसे माध्यमो से भी उपलब्ध कराई जा सकती है। पब्लिक ऑफर द्वारा धनराशि प्राप्त करने वाली कंपनियो के मामले में कड़े प्रकटीकरण मानक उपलब्ध कराए जाएं। गलत प्रकीटकरण के विरूद्ध कानून में पर्याप्त और निवारक शास्तियां होनी चाहिएं।

अल्पसंख्यक अधिकारों की सुनवाई

5. अधिनियम में ‘अल्पसंख्यक हित’ की सुरक्षा के सिद्धांत को मान्यता मिल जाने पर यह सुनिश्चित करने के लिए कि ‘अल्पसंख्यक हित’ से संबंधित ऐसे प्रावधान कंपनी के हित में कार्य करने से प्रबंधन या बोर्ड को बाधित न करें, एक उपयुक्त तंत्र स्थापित करना आवश्यक होगा। अतः बोर्ड और प्रबंधन को निवेशकों के अधिकारों में छल से कार्य करने वाले अनुचित शेयरधारकों के असंगत हस्तक्षेप से बचाया जाए।

कंपनी की बैठकों के दौरान अल्पसंख्यक शेयरधारकों के अधिकार

6. बहुधा कंपनी की बैठकें इस प्रकार आयोजित की जाती है कि अल्पसंख्यकों की प्रभावी सुनवाई नहीं हो पाती। अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित प्रक्रिया में कंपनी द्वारा ऐसे व्यवहार के विरूद्ध बचाव का प्रावधान किया जाए। बैठकों में शेयरधारकों की भागीदारी के लिए इलेक्ट्रनिक मीडिया सहित डाक मत पत्र का भी व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।

शोषण और कुप्रंधन के मामले में अधिकार

7. वर्तमान अधिनियम में शोषण और कुप्रबंधन रोकने के पर्याप्त प्रावधान हैं। अपेक्षित प्रतिशत में साम्य पूंजी धारित करने वाले सदस्यों की निर्दिष्ट संख्या द्वारा प्रतिनिधित्व कर रहे अल्पसंख्यक शेयरधारकों को अपने हितों की सुरक्षा के लिए न्यायालय/अधिकरण जाने का अधिकार है। कंपनी के कार्यों के नियमन के लिए अनेक उपाचारात्मक उपाय करने के लिए अर्ध न्यायिक संस्थान को अधिकार दिया गया है। इन उपायों में अन्य बातों के साथ-साथ अन्य सदस्यों द्वारा किसी कंपनी के सदस्यों के शेयर या हित की खरीद; प्रबंधकीय कार्मिक से संबंधित समझौतों को अस्वीकृत या संशोधित करना; वस्तु आदि के अंतरण, सुपुर्दगी से संबंधित संव्यवहार को अस्वीकृत करना अथवा किसी अन्य मामले जिसके लिए न्यायालय/अधिकरण उचित समझे, प्रावधान किया जाए। न्यायालय/अधिकरण को कंपनी के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझे जाने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति करने का भी अधिकार है।

विलयन/समामेलन/कब्जा लेने के दौरान अल्पसंख्यक शेयरधारकों के अधिकार

8.1 अधिनियम के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार किसी कंपनी द्वारा कारपोरेट पुनर्गठन (जिसमें अन्य के साथ-साथ विलयन/समामेलन शामिल है) के मामले में उच्च न्यायालय/अधिकरण का अनुमोदन अपेक्षित है। स्कीम में उच्च न्यायालय में फाइल करने से पहले शेयरधारकों द्वारा अऩुमोदित करना भी अपेक्षित है। स्कीम सभी शेयरधारकों को न्यायालय के सांविधिक नोटिस के साथ परिचालित की जाती है और शेयरधारकों द्वारा स्कीम का अनुमोदन करने के लिए स्कीम की धारा 393 के अंतर्गत स्पष्टीकरण विवरण के साथ परिचालित की जाती है।
8.2 यद्यपि इस मुद्दें पर अल्पसंख्यक शेयरधारकों का संरक्षण न भी हो स्कीम अऩुमोदित करते समय शेयरधारकों से स्कीम के विरूद्ध आपत्तियां, यदि कोई हो, तो प्राप्त करने के लिए समाचार पत्र मे प्रस्तावित स्कीम का अनिवार्य प्रचार करना आवश्यक था। कोई भी इच्छुक व्यक्ति (अल्पसंख्यक शेयरधारक सहित) न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हो सकता है। तथापि ऐसे मामले भी है जबकि न्यूनतम शेयरधारण करने वाले शेयरधारकों ने स्कीम के विरूद्ध छोटी-छोटी आपत्तियां की है ताकि स्कीम के कार्यान्वयन को रोका या स्थगित किया जा सके। अनेक मामलों में न्यायालय में उनकी आपत्तियां खारिज कर दी हैं।
8.3 अतः यह विचार है कि अधिनियम में किसी स्कीम पर आपत्ति करने का अधिकार देने के लिए एक सीमा (व्यक्तियों की न्यूनतम संख्या के अनुसार या शेयरधारण की न्यूनतम प्रतिशतता के अनुसार) रखने का विशेष प्रावधान किया जाए। ऐसी कंपनी जिसके 90 प्रतिशत शेयर अर्जित किए जा चुके है के शेष 10 प्रतिशत शेयरों के अधिग्रहण के लिए भी प्रावधान करना उपयुक्त होगा। ऐसे 10 प्रतिशत शेयरों का अर्जन केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए जाने वाले नियमो के अऩुसार किया जाए। समिति ने अध्याय X के पैरा 19 में अल्पसंख्यक शेयरधारकों को किसी व्यवस्था में बाधा डालने से रोकने के लिए आपत्तियों की एक न्यूनतम सीमा की सिफारिश भी की गई है।
8.4 कब्जा लेने के मामले में सेबी (शेयरों का महत्वपूर्ण अर्जन और कब्जा लेना) नियमन, 1997 के अऩुसार सेबी को शेयरों का महत्वपूर्ण अर्जन और कब्जा लेने के आरोपों वाले निवेशकों, मध्यस्थों या किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त शिकायतों में जांच करने के लिए जांच अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार है। सेबी अपनी जानकारी या इन नियमनों के किसी उल्लंघन की सूचना मिलने पर स्वतः जांच भी कर सकता है। अधिनियम की धारा 395 के अंतर्गत एक अंतरिती कंपनी, जिसने अंतरित कंपनी 90 प्रतिशत शेयर किसी योजना या संविदा के माध्यम से प्राप्त कर लिए हैं, को शेष 10 प्रतिशत शेयर प्राप्त करने का अधिकार है। असहमत शेयरधारकों को न्यायालय/अधिकरण जाने का मौका भी दिया गया है। यह व्यवस्था उचित प्रतीत होती है और इसे जारी रखना चाहिए। संक्षेप में क) निवेशकों द्वारा समामेलन की किसी योजना पर आपत्ति करने के लिए सदस्यों की न्यूनतम संख्या या शेयरधारण की न्यूनतम प्रतिशतता के अऩुसार एक सीमा निर्धारित की जाए; ख) धारा 395 क का प्रावधान, जिसे शेष शेयर अर्जन के लिए कंपनी (संशोधन) विधेयक, 2003 में शामिल किया गया था, पर इस संबंध में एक समुचित ढांचा तैयार करने के लिए आधार के रूप में विचार किया जाए।

अल्पसंख्यक हितो की सुरक्षा के लिए निष्पक्ष मूल्यांकन

9.1 अल्पसंख्यक हितों की सुरक्षा के लिए एक निष्पक्ष मूल्यांकन तंत्र द्वारा किसी कंपनी के शेयरों के मूल्यांकन को मान्यता दी जाए। स्वतंत्र मूल्यांकक की नियुक्ति लेखापरीक्षा समिति, जहां यह समिति है अथवा अन्य मामलो में बोर्ड द्वारा की जाएगी। शेयरधारकों को प्रक्रिया अऩुचित लगने की स्थिति में न्यायालय/अधिकरण जाने का अधिकार होना चाहिए। ऐसे मामलो में अधिकरण को स्वतंत्र मूल्यांकक नियुक्त करने का अधिकार दिया जाए। शेयरों के मूल्यांकन के लिए ये सिद्धांत उन कंपनियों के मामले में भी लागू किए जा सकते है जिन्हें असूचीबद्ध कर दिया गया है और उनका शेयरधारक आधार 1000 या अधिक है।
9.2 इसके अतिरिक्त इस समिति ने सिफारिश की है कि यदि कोई कंपनी जिसे भारत में सभी स्टॉक एक्सचेंज से असूचीबद्ध कर दिया गया है और जिसका शेयरधारक/जमाकर्ता आधार 1000 या अधिक है, हो असूचीबद्ध करने के तीन वर्ष के अंदर एक पुनः क्रय का अधिकार दिया जाए। समिति का विचार है कि शेयरों का निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करने की सिफारिश को देखते हुए इस व्यवस्था से अल्पसंख्यक हितों की सुरक्षा भी हो सकेगी।

क्लॉस एक्शन/व्युत्पन्न विवाद

10.1 गलत कार्यों, जिनके पास नियंत्रण है औऱ जो कंपनी को उसके अपने नाम से एक्शन करने से रोकते हैं, द्वारा अल्पसंख्यकों के प्रति धोखाधड़ी के मामले में ऐसे गलत निर्णयों के संबंध में व्युत्पन्न विवाद की न्यायालयों द्वारा अनुमति दी गई है। ऐसे व्युत्पन्न विवाद शेयरधारकों द्वारा कंपनी के गलत कार्यों के संबंध में उनकी व्यक्तिगत क्षमता में नहीं बल्कि कंपनी की ओर से लाए जाते है। इसी प्रकार किसी एक या एक ही प्रकार के अधिक शेयरधारकों द्वारा “क्लास/प्रतिनिधित्व एक्शन” की न्यायालयों द्वारा एकल आधार पर अनुमति दी गई है।
10.2 हालांकि अऩेक मामलों में न्यायालयों द्वारा इन सिद्धातों का समर्थन किया गया है। तथापि इन्हें कानून में शामिल किया जाना है। समिति इन सिद्धातों को मान्यता देने की आवश्यकता पर बल देती है।